
हिंदी साहित्येतिहास दर्पण
Assistant Professor GS paper ( 2025)
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प्राध्यापक भर्ती परीक्षा
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RPSC द्वारा आज आयोजित
हिंदी विषय
का प्रश्न पत्र
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@hindisahityaquiz
बुचर के अनुसार अरस्तू की अनुकरण संबंधी मान्यता के चार चरण हैं:
1.
कलाकृति मूल वस्तु का पुनरुत्पादन है।
2.
कलाकृति मूल वस्तु का पुनरुत्पादन तो है, किंतु उसके मौलिक रूप में नहीं, बल्कि उस रूप में, जैसी वह ज्ञानेंद्रियों को प्रतीत होती है। कहने का अभिप्राय यह कि कोई वस्तु जैसी रहती है, उसी रूप में कलाकृति में अभिव्यक्त नहीं होती, बल्कि ज्ञानेंद्रियों की सहायता से मन पर उसका जो बिंब अंकित होता है, उसी के अनुरूप वह कलाकृति में अभिव्यक्त होती है अर्थात कलाकृति वस्तु का प्रतिफलन नहीं, कलाकार के मनोगत बिंब का प्रतिफलन है।
3.
कलाकृति मानव जीवन के सामान्य पक्ष का अनुकरण करती है (विशेष या व्यक्तिनिष्ठ पक्ष का नहीं)।
4.
कलाकृति मानव जीवन का आदर्शीकृत प्रतिरूपण है। इस प्रकार अनुकरण किसी एक अर्थ का वाचक नहीं है उसका पूर्ण अर्थ कई तत्त्वों के योग से व्यक्त होता है- जिनमें प्रमुख हैं- पुनरुत्पादन, मानस बिंब, जीवन का सामान्य तथा आदर्श पक्ष। अरस्तु के मन में इन तत्त्वों के मिश्रित रूप का ही नाम अनुकरण है, जो प्लेटो के अनुकरण से सर्वथा भिन्न कोटि की चीज है। अतः वह उस हेय अर्थ से भी मुक्त है, जो प्लेटो के मन में रहा है।
कुबेरनाथ राय
निबंध-संग्रह :
प्रिया नीलकंठी, रस आखेटक, गंधमादन, विषाद योग, निषाद-बाँसुरी, पर्णमुकुट, महाकवि की तर्जनी, पत्र मणिपुतुल के नाम, कामधेनु, मन-पवन की नौका, किरात नदी में चंद्रमधु, दृष्टि-अभिसार, त्रेता का वृहतसाम, मराल, उत्तर-कुरू, चिन्मय भारत, वाणी का क्षीर-सागर, अंधकार की अग्निशिखा, रामायण महातीर्थम्, आगम की नाव।
चलते चलते.............
लोंगिनुस उदात्त
उदात्त अभिव्यंजना का प्रकर्ष और वैशिष्ट्य है।
उदात्त का कार्य अनुनयन नहीं, सम्मोहन है।
उदात्त यदाकदा नहीं, बल्कि सदा, सबको और संपूर्णतः सम्मोहित करता है।
उदात्त सर्जनात्मक या रचनात्मक कौशल से भिन्न तत्त्व है। उसका प्रभावक्रमिक नहीं, आकस्मिक होता है और उसके अलौकिक आलोक से कथ्य चमक उठता है।
उदात्त के अवरोधक दोष
तीन दोष उदात्त के अवरोधक हैं :
शब्दांडबर (Tumidity or bombast);
बालिशता (Puerility), तथा
भावाडंबर (Empty or false passion)।
लोंगिनुस उदात्त के पांच स्रोत मानते हैं :
1.महान विचारों के उद्भावना की क्षमता।
2.प्रबल तथा अंतःप्रेरित भाव ।
3.अलंकारों-विचारालंकार और शब्दालंकार का समुचित प्रयोग।
4.भव्य शब्द-योजना। इसमें शब्द चयन, बिंबविधान तथा शैलीगत परिष्कारअंतर्भूत हैं।
5.रचना की गरिमा और उत्कर्ष का समुचित प्रभाव।
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