
✍ धर्म की खोज DHARMA KI KHOJ
कहानी का समय
सुखी आदमी के जूते
*एक व्यक्ति अपने गुरु के पास गया और बोला, गुरुदेव, दुख से छूटने का कोई उपाय बताइए। शिष्य ने थोड़े शब्दों में बहुत बड़ा प्रश्न किया था। दुखों की दुनिया में जीना लेकिन उसी से मुक्ति का उपाय भी ढूंढना! बहुत मुश्किल प्रश्न था।*
*गुरु ने कहा, एक काम करो, जो आदमी सबसे सुखी है, उसके पहने हुए जूते लेकर आओ। फिर मैं तुझे दुख से छूटने का उपाय बता दूंगा।*
*शिष्य चला गया। एक घर में जाकर पूछा, भाई, तुम तो बहुत सुखी लगते हो। अपने जूते सिर्फ आज के लिए मुझे दे दो।*
*उसने कहा, कमाल करते हो भाई! मेरा पड़ोसी इतना बदमाश है कि क्या कहूं? ऐसी स्थिति में मैं सुखी कैसे रह सकता हूं? मैं तो बहुत दुखी इंसान हूं।*
*वह दूसरे घर गया। दूसरा बोला, अब क्या कहूं भाई? सुख की तो बात ही मत करो। मैं तो पत्नी की वजह से बहुत परेशान हूं। ऐसी जिंदगी बिताने से तो अच्छा है कि कहीं जाकर साधु बन जाऊं। सुखी आदमी देखना चाहते हो तो किसी और घर जाओ।*
*वह तीसरे घर गया, चैथे घर गया। किसी की पत्नी के पास गया तो वह पति को क्रूर बताती, पति के पास गया तो वह पत्नी को दोषी कहता। पिता के पास गया तो वह पुत्र को बदमाश बताता। पुत्र के पास गया तो पिता की वजह से खुद को दुखी बताता। सैकड़ों-हजारों घरों के चक्कर लगा आया। सुखी आदमी के जूते मिलना तो दूर खुद के ही जूते घिस गए।*
*शाम को वह गुरु के पास आया और बोला, मैं तो घूमते-घूमते परेशान हो गया। न तो कोई सुखी मिला और न सुखी आदमी के जूते।*
*गुरु ने पूछा, लोग क्यों दुखी हैं? उन्हें किस बात का दुख है?*
*उसने कहा, किसी का पड़ोसी खराब है। कोई पत्नी से परेशान, कोई पति से दुखी तो कोई पुत्र से परेशान है। आज हर आदमी दूसरे आदमी के कारण दुख भोग रहा है।*
*गुरु ने बताया, सुख का सूत्र है - दूसरे की ओर नहीं, बल्कि अपनी ओर देखो। खुद में झांको। खुद की काबिलियत पर गौर करो। प्रतिस्पर्द्धा करनी है तो खुद से करो, दूसरों से नहीं। जीवन तुम्हारी यात्रा है। दूसरों को देखकर अपने रास्ते मत बदलो। खुद को सुनो, खुद को देखो। यही सुख का सूत्र है।*
*शिष्य बोला, महाराज, बात तो आपकी सत्य है लेकिन यही आप मुझे सुबह भी बता सकते थे। फिर इतनी परिक्रमा क्यों करवाई?*
*गुरु ने कहा, वत्स, सत्य दुष्पाच्य होता है। वह सीधा नहीं पचता। अगर यह बात मैं सुबह बता देता तो तू हर्गिज नहीं मानता। जब स्वयं अनुभव कर लिया, सबकी परिक्रमा कर ली, सबके चक्कर लगा लिए, तो बात समझ में आ गई। अब ये बात तुम पूरे जीवन में नहीं भूलोगे।*
*जीवन तुम्हारी यात्रा है। दूसरों को देखकर अपने रास्ते मत बदलो।*
अचानक सिद्धि कैसे प्राप्त हो जाती है रहस्य
क्या तुमने प्राकृतिक को अपने जैसा जड़ बुद्धि मान लिया हैं हां भाई वाकई में मान ही लिया है इसमें किसी तरह का कोई संदेह नहीं है क्योंकि अगर नही मानते तो लालच, स्वार्थ, और अनेकों बुराई लेकर साधना के छेत्र में सिद्धि के उद्देश्य हेतु प्रवेश करते इससे जायदा बड़ी जड़ता और बेवकूफी क्या हो सकती है स्वय विचार करो
अगर किसी के अंदर कोई स्वार्थ, बुराई, अवगुणी प्रवृति है और उसी दौरान अगर उसे कोई सिद्धि प्राप्त हो गई तो क्या उसका सदुपयोग संभव हैं पहली बात तो उसके रहते कोई सात्यिक सिद्धि की प्राप्ति होती नही हैं क्योंकि ये सभी चित्त को बांधने की कार्य करती है सिद्धि मुक्त मन अर्थात चेतना की विकसित अवस्था होती अर्थात मन को वो हिस्सा जो बंधन के रहते हुए सुप्त हो चुका है चित्त विषय रूपी माया के चक्रव्यूह से निकल कर कभी वहां तक पहुंचा ही नही इसलिए वो स्थान सुप्त पड़ी रहती है जब तक अवगुणी और विषयक प्रवृति चित्त में आवरण स्वरूप स्थित है तब तक चित्त उससे मुक्त होकर चेतना की उस अवस्था को कभी भेद ही नही पाएगा
और आए दिन अनेकों लोगो के द्वारा अनेकों सिद्धि जागरण करवाने की।दावे शिविर लगाए जाते है लोगो को आकर्षित किए जाते है और १०० में से ९५ प्रतिशत लोग उसी आकर्षण में फंस कर साधना के छेत्र में प्रवेश करते है और ऐसे ऐसे ढोंगी पाखंडी के सदयंत्र का शिकार होते रहते हैं
जो साधक साधना को अपने मुक्ति का उद्देश्य उस अनंत सत्ता से एकाकार और अपनी ध्येय को विराटता प्रदान करने की नियत से प्रवेश करते ईश्वर के प्रति सच्ची व्याकुलता, और प्रेम रखते है वो कभी इस तरह के आकर्षण और सिद्धि के लोभ में साधना में प्रवेश नही करते और न ही उनकी दृष्टि साधना के प्रति इस तरह की होती है और सच बोलूं तो ऐसे ही साधक को।बिना मांगे बिना उनकी ईक्षा की उन्हें सर्वस्व की प्राप्ति ईश्वर की प्राप्ति और परम मुक्ति अवश्य प्राप्त होती हैं
आत्मनिरीक्षण
दो आदमी यात्रा पर निकले! दोनों की मुलाकात हुई, दोनों का गंतव्य एक था तो दोनों यात्रा में साथ हो चले।
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सात दिन बाद दोनों के अलग होने का समय आया तो एक ने कहा: भाई साहब! एक सप्ताह तक हम दोनों साथ रहे क्या आपने मुझे पहचाना?
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दूसरे ने कहा: नहीं, मैंने तो नहीं पहचाना।
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पहला यात्री बोला: महोदय मैं आपके शहर का नामी ठग हूँ परन्तु आप तो महाठग हैं। आप मेरे भी गुरू निकले।
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दूसरे यात्री बोला: कैसे?
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पहला यात्री: कुछ पाने की आशा में मैंने निरंतर सात दिन तक आपकी तलाशी ली, मुझे कुछ भी नहीं मिला।
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इतने दिन साथ रहने के बाद मुझे यह पता है आप बहुत धनी व्यक्ति हैं और इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं तो ऐसा कैसे हो सकता है कि आपके पास कुछ भी नहीं है? बिल्कुल खाली हाथ हैं!
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दूसरा यात्री: मेरे पास एक बहुमूल्य हीरा है और थोड़ी-सी रजत मुद्राएं भी है।
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पहला यात्री बोला: तो फिर इतने प्रयत्न के बावजूद वह मुझे मिले क्यों नहीं?
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दूसरा यात्री: मैं जब भी बाहर जाता, वह हीरा और मुद्राएं तुम्हारी पोटली में रख देता था और तुम सात दिन तक मेरी झोली टटोलते रहे।
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अपनी पोटली सँभालने की जरूरत ही नहीं समझी। तो फिर तुम्हें कुछ मिलता कहाँ से!
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ईश्वर नित नई खुशियाँ हमारी झोल़ी मे डालते हैं परन्तु हमें अपनी गठरी पर निगाह डालने की फुर्सत ही नहीं है, यही सबकी मूलभूत समस्या है।
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जिस दिन से इंसान दूसरे की ताकझाख बंद कर देगा उस क्षण सारी समस्या का समाधान हो जाऐगा।
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अपनी गठरी टटोलें! जीवन में सबसे बड़ा गूढ मंत्र है स्वयं को टटोले और जीवन-पथ पर आगे बढ़े.. सफलताये आप की प्रतीक्षा में है।
सारे संसार के पुण्यपाप सुकर्म कुकर्म करने कराने वाली महती स्वरूपा जो महालक्ष्मी नाम से विख्यात भगवति है, वह मैं ही हूं।
प्रचुर रूप से आश्रयण करने से मेरा ही नाम महाश्री है ।
चण्ड की प्रिया भार्या मैं ही हूं,प्रचण्डता के कारण
मेरा नाम यह नाम चण्डी हुआ है।
कल्याणरूपा में भदा हूँ, सबको एकजुट बनाये रखती हूँ इसलिये मेरा ही नाम काली है काल रूप से से सभी को भयभीत रखती हूँ इसलिये भी मेरा नाम काली है।
सत् असत् की द्बिधा में सज्जन प्रेमियों को भी भयभीत रखती हूँ इसलिये माया गुणात्मिका भद्रकाली के नाम से मैं प्रसिद्ध है।
महत्व से मेरा नाम महामाया है, सबको मोहित करती हूँ इसलिये मैं मोहिनी हूँ मेरे पाने का मार्ग कठिन है इसलिये लोग मुझे दुर्गा कहते हैं, कठिन से कठिन कष्टों से भक्तों की रक्षा करती हूँ ,इससे भी मेरा नाम दुर्गा है।
ज्ञान से समायुक्त होने पर मैं योग हूँ और योगमाया नाम से प्रसिद्ध हूँ, माया का ज्ञान योग से ही होता है। यास्क के अनुसार माया वयुनं ज्ञानम् है अर्थात् ज्ञान ही माया है, सम्भवाम्यात्ममायया आत्मसङ्कल्प से ही माया होती है, मनुष्यों में ज्ञानयोजन से योगमाया होती है, ।
जिस भगवती में सम्पूर्ण छः गुणों-ज्ञान, शक्ति, बल, वीर्य, तेज और ऐश्वर्य का पूर्णत्व रहता है वही भगवती मैं हूँ।
वैवाहिक यज्ञ के संयोग से मैं भगवान् की पत्नी हूँ।
भगवत् यज्ञ के आश्रितजनों की रक्षा हेतु मैं स्वयं भगवत् स्वरूप हूँ, भगवत् शक्ति के बिना भगवान् भी कुछ कार्य नहीं कर सकते इसलिये यज्ञाश्रितों की रक्षा में लक्ष्मी का स्वरूप पुरूषत्व युक्त हो जाता है।
विशालता से मैं आकाश हूँ, पूर्णता से मुझे पुरी कहा जाता है,
मैं पूर्ण करती हूँ इसलिये पुरी कही जाती हूँ। मेरे परावर स्वरूप से विद्वान् मुझे परावरा कहते हैं।
शकन-सकना-सामर्थ्य के कारण मुझे शक्ति कहा जाता है, लोगों की रक्षा करके सुखी करती हूँ इसलिये राज्ञी कहा जाता है, मेरा स्वरूप निरन्तर अविकारी रहता है, शान्त रहता है इसलिये मुझे शान्ता कहा जाता है।
यह अखिल विश्व मेरी कृति है, मेरे द्वारा निर्मित है इसलिये मैं प्रकृति नाम से विश्रुत हूँ। लोकों का आश्रय हूँ इसलिये श्रयन्ती श्रयणीया हूँ, सज्जनों के कष्टों को मैं दूर करती हूँ ।
मैं दीन-दुःखियों की पुकार सुनती हूँ, त्रिगुणों से जगत् की सृष्टि करती हूँ, सभी भूतों का आश्रय हूँ, सभी पुनीत कर्मों में
मैं रमा हूँ।
मैं सदैव देवों से प्रशंसित हूँ, मैं वैष्णवों का शरीर हूं,
, वेद-वेदान्त के ज्ञानी जनों के द्वारा मुझमें इतनें गुण देखे गये हैं। श्री में श+र+ई हैं शं से श से शयेन्तः र से रमा और ई से ईड
अर्थात् स्तुति का समावेश है।
गुणयोग विधान के विद्वान् मुझे श्री रूप में देखते हैं,
इस प्रकार मैं सर्वरूपमयी और सनातनी भगवती हूँ।
तीनों गुणों की मैं स्वामिनी हूं मेरी ख्याति त्रिगुण रूप में है। सृष्टि की इच्छा से मैं अपने गुणों में विषमता असमानता की प्रवृत्ति उत्पन्न करती हूं।
तपाये हुए सोने के समान मेरी आभा है, शुद्ध स्वर्णनिर्मित मेरे आभूषण हैं, आलोकविहीन लोकों को मैं अपने तेज से पूर्ण प्रकाशित करती हूँ।
सृष्टि के पूर्व अखिल लोक शून्य रहता है उसे मैं अपने से पूर्ण कर देती हूँ तब सृष्टि होती है, यह सतोगुणमयी होती है, केवल तमोगुण से मैं दूसरा रूप ग्रहण करती हूँ।
उसका वर्ण अञ्जन के समान काला होता है, सुन्दर मुख दंष्टो से युक्त होता है, उसकी आँखें बड़ी-बड़ी होती हैं, कमर पतली होती है।
उसकी विशाल चार भुजाओं में खड्ग, पात्र, नरमुण्ड और गदा शोभित रहते हैं, गले में कबन्धों का हार होता है, शिर पर नरमुण्डों की माला होती है।
तमोगुण से उत्पन्न नारियों में उत्तम, उसने मुझसे कहा हे माते तुम्हें नमस्कार है, मुझे मेरा नाम और कर्म बतलाइये ।
श्रीआद्यामहालक्ष्मी ने कहा, --उस सुन्दर कुल्हों वाली तामसी, रमणियों में श्रेष्ठ भगवती से मैंने कहा
कि मैं तुम्हारे जो-जो नाम और कर्म हैं, उन्हें बतलाती हूँ।
महाकाली, महामाया, महामारी, क्षुधा, निद्रा, तृष्णा, एकवीरा, कालरात्रि, दुरत्यया- ये दश तुम्हारे नाम हैं। नामों से निष्पन्न अर्थ के अनुसार तुम्हारे कर्म होंगे, इन नामों का जप
जो करेगा उसे सभी सुख प्राप्त होंगे।
इस सृष्टि को अपर्याप्त समझकर मन्यमाना आदि रूप से मैंने सत्त्वोन्मेष से चन्द्रमा के. समान सुन्दर नारी को प्रकट किया।
उनके चारों हाथों में अक्षमाला, अंकुश, वीणा और पुस्तक शोभित थे, उस श्रेष्ठ नारी को मैंने नाम और कर्म बतलाया।
उनके नाम हैं-महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्सरस्वती, आर्या, ब्राह्मी, महाधेनु, वेदगर्भा, बुद्धीवरी
नामानुरूप निष्पत्र अर्थ ही उसके कार्य बतलाये गये, उसके सत्त्व गुणमय कार्य आश्चर्यजनक है। हम तीनों महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती ही जगजननी संसार को पालन करने वाली देवियों कही जाती हैं।
हरि ॐ तत्सत्
#सर
्वकारणम्_विश्वस्वरूपम्!!
(आद्यामहालक्ष्मी महिमास्तोत्र)
ॐ श्री ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ ह्री श्रीं क्रीं आद्या भगवति परमेश्वरी महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं सौ: आद्यामहालक्ष्मी कमलधारिण्यै सिंहवाहिन्यै नमः।
इस स्तोत्र के पाठ से सम्पूर्ण शरीर झनझना जाता है, एक बिजली सी कौंध उठती है और साधक के हृदय में एक परम दिव्य विद्युत के रूप में श्रीलक्ष्मी प्रादुर्भावित हो जाती है। इस स्तोत्र को पढ़कर दाहिने हाथ की अनामिका अंगुली से अगर श्रीयंत्र या शालिग्राम शिला को स्पर्श कर दिया जाये तो उसमें तुरंत लक्ष्मी चैतन्यता, प्राण-प्रतिष्ठित हो जाती है।
( ऐसा सिद्ध साधकों का अनुभव है)
सर्वस्याद्या महालक्ष्मीस्त्रिगुणाहं महेश्वरी।
रजोरूपमधिष्ठाय सृष्टिमिष्टां करेम्यहम्।।
अग्रीषौममयौ भावो दिव्यौ स्त्रीपुंसलक्षणौ ।
विभ्रति चारूसर्वांंगी लोकानां हितकाम्यया ।।
चतुर्भुजाम् विशालाक्षी तप्तकाञ्चनसन्निभा
मातृलुंगं गदा खेटं सुधापात्रं च विभ्रति।।
महालक्ष्मी: समाख्याता साहं सर्वाङ्गसुन्दरी ।
महाश्रीः सा महालक्ष्मीश्चण्डा चण्डी च चण्डिका ॥
भद्रकाली तथा भद्रा काली दुर्गा महेश्वरी ।
त्रिगुणा भगवत्पत्नी तथा भगवती परा।।
एताः सञ्ज्ञास्तथा चान्यास्तत्र मे बहुधा स्मृताः ।
विकारयोगादन्याश्च तास्ता वक्ष्याम्यशेषतः ।।
लक्षयामि जगत्सर्व पुण्यापुण्ये कृताकृते।
महनीया च सर्वत्र महालक्ष्मी: प्रकीर्तिता ।।
महद्भिः श्रयणीयत्वान्महाश्रीरिति गद्यते।
चण्डस्य दयिता चण्डी चण्डत्वाच्चण्डिका मता ।।
कल्याणरूपा भद्रास्मि काली च कलनात्सताम् ।
द्विषतां कालरूपत्वादपि काली प्रकीर्तिता ।।
सुहृदां द्विषतां चैव युगपत्सदसद्विधेः ।
भद्रकाली समाख्याता मायाश्चर्यगुणात्मिका ॥
महत्वाच्य महामाया मोहनान्मोहिनी मता ।
दुर्गा च दुर्गमत्वेन भक्तरक्षाविधेरपि।।
योजनाच्चैव योगाहं योगमाया च कीर्तिता ।
मायायोगेति विज्ञेया ज्ञानयोजनतो नृणाम् ।।
पूर्णषाड्गुण्यरूपत्वात् साहं भगवती स्मृता ।
भगवद्यज्ञसंयोगात् पत्नी भगवतो ऽस्म्यहम् ॥
विशालत्वात्समृता व्योम पूरणाच्च पुरी स्मृता।
परावरस्वरूपत्वात् स्मृता चाहं परावरा।।
शकनाच्छक्तिरुक्ताह राज्यहं रञ्जनात् सदा।
सदा शांतविकारत्वाच्छान्ताहं परिकीर्तिता ।।
मत्तः प्रक्रियते विश्वं प्रकृतिः सास्मि कीर्तिता ।
श्रयन्ती श्रयणीयास्मि श्रृणामि दुरितं सताम् ।।
श्रृणोमि करुणां वाचं शृणामि च गुणैर्जगत् ।
शयेऽन्तः सर्वभूतानां रमेऽहं पुण्यकर्मणाम्।।
ईडिता च सदा देवैः शरीरं चास्मि वैष्णवम् ।
एतान्मयि गुणान् दृष्ट्वा वेदवेदान्तपारगाः । ।
गुणयोगविधानज्ञाः श्रियं मां सम्प्रचक्षते।
साहमेवंविधा नित्या सर्वाकारा सनातनी ।।
गुणत्रयमधिष्ठात्री त्रिगुणा परिकीर्तितः।
गुणवैषम्यसर्गाय प्रवृत्ताहं सिसृक्षया ।।
तप्तकाञ्चनवर्णाभा तप्तकाञ्चनभूषणा।
निरालोकमिमं लोकं पूरयामि स्वतेजसा ।।
शून्यं तदखिलं लोकं स्वेन पूरयितुं पुरा ।
भरामि त्वपरं रूपं तमसा केवलेन तु।।
सा भिन्नाञ्जनसङ्काशा दंष्ट्राञ्चितवरानना ।
विशाललोचना नारी बभूव तनुमध्यमा।।
खगपात्रशिरः खेटेरलङ्कृतमहाभुजा ।
कबन्धहारा शिरसि विभ्राणाहिशिरः स्त्रजम्।।
तामब्रवं वरारोहा तामसीं प्रमोदोत्ताम्।
ददामि तव नामानि यानि कर्माणि तानि ते।।
महाकाली महामाया महामारी क्षुधा तृषा।
निदा कृष्णा चैकवीरा कालरात्रिदुरत्यया ।।
एतानि तव नामानि प्रतिपाद्यानि नामभि:।
एभिः कर्माणि ते ज्ञात्वा योऽधीते सोऽश्नुते सुखम् ।।
अपर्याप्तमिमं सर्ग मन्यमानाहमादिमम्।
सत्त्वोन्मेषमयं रूपं भरामि स्मेन्दुसन्निभम् ।।
अक्षमालाङ्कुशधरा वीणापुस्तकधारिणी ।
सा बभूव वरा नारी नाम कर्म तदा ह्यदाम् ।।
महाविद्या महावाणी भारती वाक् सरस्वती ।
आर्या ब्राह्मी महाधेनुर्वेदगर्भा च श्रीश्च गीः ।।
नामानुरूपं कर्म स्यात् सात्त्विक्याः कार्यमद्भुतम् ।
वयं तिम्रो जगद्धात्र्यो मातरश्च प्रकीर्तिताः ।।
श्लोकों का हिन्दी अनुवाद
सबका आदि कारण त्रिगुणमयी महेश्वरी मैं महालक्ष्मी हूँ, रजोरूप से अधिष्ठित होकर मैं इच्छानुसार सृष्टि करती हूँ ।
अग्नि और चन्द्रमय भाव से दिव्य स्त्री-पुरूष के लक्षणों से युक्त लोककल्याण की कामना से मैं सर्वांगसुन्दर रूप से शोभायमान होती हूँ।
तपाये हुए सोने के समान वर्ण की, बड़े-बड़े नयनों वाली, चार भुजाओं से युक्त मैं सुशोभित होती हूँ, मेरे चारों हाथों में मातुलुङ्ग, गदा, खेट और अमृतपात्र शोभित रहते हैं ।
महालक्ष्मी नाम से जो विख्यात देवी हैं, वह सर्वागसुन्दरी में ही हूँ, मैं ही महालक्ष्मी, महाश्री, चण्डा, चण्डी तथा चण्डिका हूं।
मैं ही भद्रकाली, भद्रा, काली, दुर्गा, महेश्वरी भगवत्पत्री, त्रिगुणमयी, परा भगवती हूँ।
मेरे इतने नामों के अतिरिक्त अन्य कई नामों से लोग मुझे पुकारते हैं। विकार- योग से जो मेरे रूप नाम हैं उनका वर्णन अब मैं करती हूँ ।
श्री किशोरी जी प्रेम-रस एवं रूप की अनंत राशि हैं। उनकी जो उपासना करता है वह सहज ही दिव्य रास-रस प्राप्त करता है। इतना ही नहीं, वह किशोरी जी की सहचरी बनकर उनके साथ नित्य विहार करता है। उसे आधे पल के लिये भी रस का वियोग नहीं हो सकता। वह सदा स्वरों को साध कर अनुराग-युक्त विविध रागों के द्वारा किशोरी जी के गुणों को गाकर उन्हें प्रसन्न करता है एवं ‘धा-तिर-किट-धा-धा’ आदि नृत्य के शब्दों का उच्चारण करता हुआ विविध हाव-भाव द्वारा अलौकिक नृत्य करता है। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि वह इस प्रकार सहज ही श्यामा-श्याम के दिव्य प्रेमानन्द का निरन्तर अनुभव करता हुआ कृतार्थ रहता है
कहानी का समय
एक घंटी
नीरा हमेशा हँसती-खिलखिलाती रहने वाली महिला थी। उसका छोटा-सा परिवार—पति, माँ और आठ साल की बेटी सिया—उसी की मुस्कान से घर बन जाता था। सुबह का वक्त था। रसोई में चाय की खुशबू और गैस पर चढ़ी रोटी की महक एक साथ घुल रही थी। तभी मोबाइल की घंटी बजी—रीजते रिश्तों की आदतों की तरह, अचानक और बिना बताए।
नीरा ने सोचा—“बस दो मिनट की ही तो बात है।” एक हाथ से पलटी उठाई, दूसरे हाथ से फोन कान पर लगा लिया। दूसरी तरफ उसकी बचपन की सहेली थी। बातें पुरानी यादों की तरह बह निकलीं। चूल्हे की आँच तेज हो रही थी और रोटी धीरे-धीरे जलने लगी, मगर नीरा हँसी में डूबी रही। तभी फोन का कंपन थोड़ा तेज हुआ, मोबाइल उसके हाथ से फिसला—सीधे गैस के पास।
एक पल… और नीरा का पूरा संसार जैसे थम गया। लपटें उठीं, डर ने साँस रोक दी। नीरा का हाथ हल्का-सा जल गया। सिया दौड़कर आई—“माँ!” उसकी काँपती आवाज़ नीरा के कानों में किसी सचेत पुकार की तरह गूँज उठी। पति ने तुरंत गैस बंद की, पानी डाला और नीरा का हाथ पकड़ लिया—कंपकंपाता हुआ, मगर संभालता हुआ।
दर्द केवल हाथ का नहीं था। नीरा के भीतर अपराधबोध का एक बड़ा-सा बोझ उतर आया। उसने सिया को सीने से लगाया—“मुझे माफ कर दो… मैंने तुम्हारे सामने अपनी ही लापरवाही की मिसाल छोड़ दी।” सिया ने छोटे हाथों से उसकी आँखे पोंछ दीं। माँ बोली—“बेटी, फोन बाद में होता है, ज़िंदगी पहले।”
उस रात नीरा ने मोबाइल को रसोई से बाहर रख दिया। दीवार पर कागज़ चिपका—
“गैस पर काम करते समय फोन नहीं उठाऊँगी। ज़िंदगी का कॉल हमेशा पहले है।”
अगले दिन उसने अपनी सहेलियों को फोन किया। पहले ही वाक्य में कहा—“बोलने से पहले बस एक बात पूछ लेना, क्या मैं रसोई में तो नहीं हूँ?” हर दोस्त चुप हुई, फिर बोली—“यह तो हम सबके लिए ज़रूरी है।”
नीरा ने समझ लिया—खतरा हमेशा शोर करके नहीं आता, कभी-कभी सिर्फ एक घंटी बनकर भी आता है।
उस दिन के बाद उसके घर में एक नियम बन गया—
रसोई में केवल आग जले, फोन नहीं।
और सिया अक्सर मुस्कुराकर कहती—
“मेरी माँ ने मोबाइल नहीं, ज़िंदगी पकड़ ली।”
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ज़िंदगी से बढ़कर कोई चीज़ नहीं है—न फोन, न बातचीत, न छोटी सुविधा। रसोई में गैस और आग के बीच मोबाइल का उपयोग बड़ा खतरा बन सकता है और एक क्षण की लापरवाही पूरे परिवार की खुशियों को जला सकती है। सजग रहना प्रेम का ही एक रूप है, क्योंकि अपनी सुरक्षा से हम अपने परिवार की सुरक्षा भी करते हैं। इसलिए काम करते समय पूरा ध्यान उसी पर रखें, विशेषकर रसोई में गैस जल रही हो तो फोन बाद में उठाएँ। याद रखें—कॉल वापस आ सकता है, जीवन नहीं।
मनसा माता की पूजा केवल आस्था नहीं, एक सिद्ध उपाय है — कालसर्प दोष से मुक्त होने का। वह माता हैं, नागों की भी, और मनुष्यों की भी। जो उन्हें सच्चे भाव से स्मरण करता है, उसकी रक्षा स्वयं आस्तिक जैसे दिव्य ऋषि करते हैं। उनकी पूजा करने वाला व्यक्ति सर्पदोष, भय और जीवन की विषबाधाओं से मुक्त हो जाता है।
।। जय मनसा माता ।।
सर्पो की माता --- मनसा देवी
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कालसर्प दोष एक ऐसा ज्योतिषीय योग है, जो जातक के जीवन में अनेक बाधाएँ, कष्ट और रुकावटें लाता है। पिछले लेख में हमने इस दोष के प्रभाव और सामान्य उपायों का वर्णन किया था। परंतु आज हम चर्चा कर रहे हैं कि मनसा माता की पूजा कालसर्प दोष में क्यों सर्वश्रेष्ठ मानी गई है? इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक, पौराणिक और तार्किक कारण छिपा है।
कद्रू_विनता_कथा
नागों_को_शाप
महाभारत में वर्णित प्रसिद्ध कथा है— कश्यप ऋषि की दो पत्नियाँ थीं: कद्रू और विनता। कद्रू नागों की माता बनीं, और विनता के पुत्र बने गरुड़देव। समुद्र मंथन के समय जो श्वेत अश्व उच्चैश्रवा निकला, उसे लेकर कद्रू और विनता में विवाद हुआ। कद्रू ने कहा कि अश्व की पूंछ काली है, जबकि विनता ने उसे पूर्णतः श्वेत बताया। शर्त यह थी कि जो गलत निकले, वह दूसरी की दासी बनेगी।
कद्रू ने अपने पुत्रों – नागों – से कहा कि वे अश्व की पूंछ में लिपट जाएं ताकि वह काली दिखे। कुछ नागों ने आदेश नहीं माना, तो क्रोधित होकर कद्रू ने उन्हें श्राप दिया कि वे जनमेजय के सर्पयज्ञ में भस्म हो जाएंगे। इसी से नाग वंश पर संकट छा गया।
नाग_वंश_की_रक्षा_हेतु_प्रयास
इस संकट से व्यथित होकर शेषनाग तपस्या में चले गए और वासुकि नाग ने नागों की रक्षा हेतु उपाय खोजा। उन्होंने ब्रह्माजी से परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा कि जरत्कारु ऋषि से उत्पन्न पुत्र ही नागवंश को सर्पयज्ञ से बचा सकता है। लेकिन समस्या यह थी कि ऋषि जरत्कारु ने आजीवन ब्रह्मचर्य का संकल्प ले रखा था।
जरत्कारु_ऋषि_और_उनके_पितरों_की_करुण_दशा
एक दिन ऋषि जरत्कारु ने एक भयंकर दृश्य देखा — कुछ पितर खस के एक सूखे तिनके से लटक रहे हैं, जिसकी जड़ को कालरूप चूहा काट रहा था। पितरगण कष्ट में थे। उन्होंने ऋषि से कहा कि वे उसी वंश के हैं, और संतानहीन होने के कारण वे नर्क भोग रहे हैं। जरत्कारु ऋषि अपने ही पितरों की दुर्दशा देखकर विचलित हो गए। उन्होंने संकल्प लिया कि वे विवाह करेंगे — लेकिन शर्त रखी कि कन्या भी जरत्कारु नाम की हो, उन्हें भिक्षा स्वरूप दी जाए, और वे उसका पालन-पोषण नहीं करेंगे।
वासुकि_की_बहन_जरत्कारु_से_विवाह
यह एक संयोग था कि वासुकि की बहन का नाम भी जरत्कारु था और वह भी तपस्या से क्षीणकाय हो चुकी थी। वासुकि ने अपनी बहन को ऋषि को भिक्षा रूप में समर्पित कर दिया और उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी ली। इस प्रकार उनका विवाह सम्पन्न हुआ ।
आस्तिकमुनि_का_जन्म
जरत्कारु ऋषि ने पत्नी से शर्त रखी कि वह कोई भी अप्रिय कार्य न करे, अन्यथा वे त्याग देंगे। एक दिन ऋषि ध्यान में लीन थे, सूर्यास्त हो गया। उनकी पत्नी ने धर्म की रक्षा हेतु उन्हें जगाया, जिससे क्रोधित होकर ऋषि उन्हें छोड़कर चले गए। जाते समय उन्होंने बताया कि उनके गर्भ से एक तेजस्वी पुत्र जन्म लेगा, जो महान ऋषि होगा।
समय आने पर आस्तिक मुनि का जन्म हुआ। यह वही पुत्र था, जिसके लिए ब्रह्माजी ने भविष्यवाणी की थी — जो नाग वंश की रक्षा करेगा।
जनमेजय_का_सर्पयज्ञ_और_नागों_की_रक्षा
राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए महान सर्पयज्ञ आरंभ किया। अनेक नाग यज्ञ में गिरते ही भस्म हो गए। तभी आस्तिक मुनि वहाँ पहुँचे और अपनी तपस्या, ज्ञान और वाणी से राजा को प्रभावित कर यज्ञ को रोक दिया। इस प्रकार नाग वंश का नाश रुक गया।
मनसा_माता: नागों की रक्षक, आस्तिक की जननी ।। यह जरत्कारु माता का नाम ही मनसा माता है ।। मनसा माता को सर्पों की देवी माना जाता है। वे स्वयं वासुकि की बहन हैं और आस्तिक मुनि की माता भी। उनके भीतर मातृत्व, करुणा और तपस्या की शक्ति समाहित है। वे काल की पुत्री और नागों की माता हैं, इसीलिए उनका एक नाम "आस्तिक माता" भी है।
आज भी नाग वंश के प्रतीक रूप में सभी सर्प उन्हें पूजनीय माता मानते हैं। जो भक्त मनसा माता की सच्चे भाव से आराधना करता है, उन्हें सर्पदोष, भय या बाधा छू तक नहीं सकती।
कालसर्प दोष में क्यों लाभकारी है मनसा माता की पूजा?
मनसा_माता_स्वयं_सर्पों_की_अधिष्ठात्री_देवी_हैं।
वे नागों की रक्षक और आस्तिक जैसे महान पुत्र की जननी हैं, जिन्होंने सर्पयज्ञ को रोका। मनसा माता की आराधना सर्पों की कृपा और शांति को प्राप्त करने का सीधा उपाय है।
वे काल की पुत्री हैं — अतः कालसर्प दोष का कारण बनने वाली ऊर्जाओं को नियंत्रित करने की क्षमता रखती हैं।
जो मनसा माता को प्रसन्न करते हैं, उन्हें सर्प, भय और बाधा से मुक्ति अवश्य मिलती है।
विचित्र
मनुष्यों की जिज्ञासा आवश्यकता व जिज्ञासा ही ज्ञान विज्ञान की तरफ लेजाती है विज्ञान ने हमे नये सुख के साधन दिये पर फिर हम अधूरा महसूस करते है हम गरीब या अमीर स्त्री या पुरूष हमे एक खोज रहती हम अपने को अधुरा महसूस करते है किसे केपास झोपड़ी या महल पैदल हो या महंगी गाडी पर सब को साढे तीन फुट चौडी ओर छः फुट लम्बी आप जिन्दा है तो भी और मर गये तो भी कोई करोड़ों कमाकर भी चार रोटी खाता है और कोई भीख मांग कर भी कोई बहुत बडी जमीन का मालिक है और किसी के पास एक इंच भी नही पर रहते सब जमीन पर ही!
प्रत्येक जिनके शरीर पर रोम (शल्क भी रोम मे ही सम्मिलत है)क्यो होते ? मूलाधार चक्र मे ही प्रजनन अंग क्यो है? केन्द्र से ही सब भूतो( पदार्थों) का नियन्त्रण क्यो होता है? सभी प्राणियों मे पाव कछुए के पांवो के स्थान पर ही क्यो? मस्तिष्क सहस्रार मे ही क्यो? प्रभामण्डल क्या है? सभी पदार्थों से निकलने वाली तरंगें क्यो है? देव और दानवरूप जीव जन्तु भी सर्वत्र है, आधुनिक विज्ञान भी ब्रह्माण्ड की छाया ढूढ रहा है यह वही स्थान है जहां ब्रह्माण्ड की ऋण तरंगें निकलती है।
यह ईशान कोण की ओर साठ डिग्री कोण पर नीचे झुका हुआ तो इसकी छाया इससे कई गुणा बडी है यही ऋण ब्रह्माण्ड है और इसमे भी प्राणियों एवं शक्तियों का अस्तित्व है वैदिक विद्वानों का कथन है कि ऊर्जा शरीर प्राणी भी होते है और यह भी हो सकता है कि किसी विशेष तारे के ग्रह पर वह आक्सीजन की जगह पर अग्नि की लपटों से जीवनशक्ति प्राप्त करता हो
चेतना स्थल संयोग के समीकरण का फल नही है अपितु चेतना सर्वत्र व्याप्त है और इसके अनगिनत रूप है स्थूल शरीर तो यह अपनी प्रकृति को अनुसार निर्मित करता है पृथ्वी की परिस्थितियों मे बने शरीर मे आक्सीजन की आवश्यकता है तो यह आवश्यक नही कि किसी अन्य ग्रह की परिस्थितियों मे निर्मित शरीर मे भी उस शरीर को आक्सीजन चाहिए परिस्थितियों ये अनुसार शरीर, भोजन और आक्सीजन की मात्रा आदि का अभूतपूर्व अन्तर तो पृथ्वी पर भी प्राणियों मे दिखाई पडता है ।
मछली से लिए आक्सीजन से अधिक उसे पानी की आवश्यकता होती है कुत्ते को सडा गला मांस पोषण देता है। पर मनुष्य उसे खाते ही मर जाता है इसलिए किसी विशेष संयोग को जीवन का कारण मानना मुर्खतापूर्ण सिद्धांत है रशियन वैज्ञानिको ने 1500 डिग्री फेर नाईट पर अग्नि भक्षण करने वाले जीवाणु की तलाश की है
आपके सामने मच्छर है ये वातावरण को प्रतिरोधी तत्त्वों से किस तरह एडजस्ट करते है इसका अनुभव आपको हो रहा है इसलिए कोई भी संयोग या परिस्थिति जीवनतत्त्व का कारण नही है चेतना का मूल बीज उत्पन्न नही होता अपितु चेतना का मूल वास्तव मे है शेष सभी निर्माण वह अपनी शक्ति से परिस्थितियों को अनुसार करता है।
जब साधक गुरु मार्गदर्शन का बार-बार तिरस्कृत और उपेक्षित करता हुआ टाल-मटोल करने लगे अपनी अनुभूतियों में गुरु ईष्ट का कोई औचित्य नहीं रहता हो ऐसे साधक अपने मन गढंत विचारधारा को लेकर आराधना करते हैं या नये कल्पनाओं में नये गुरूओं के आदेश में चल रहे हैं।ऐसे शिष्यों के विषय में गुरु को गहन चिंतन आत्ममंथन की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि वह सत्य से बहुत दूर जा रहा है।