
💠✨सनातन रहस्य ✨💠 💠✨ Sanatan Rahasya✨💠
🔱
1.5K+ Books vs 150 Books — सच क्या है?
कई लोग पूछते हैं —
Kailash Rahasya
(
सनातन रहस्य की personal library - channel इतना पुराना सिर्फ owner के लिए ) में 1500+ पुस्तकें हैं,
और
Rudralok
में केवल 150 ही क्यों?
उत्तर बहुत सीधा है —
📚
*हर पुस्तक ज्ञान नहीं होती, और हर ज्ञान सार्वजनिक नहीं होता।*
जब मैं तंत्र ग्रंथ पढ़ता था, बार-बार एक बात मिलती थी —
“इदं गोपनीयम्… शिव द्वारा गुप्त रखा जाए।”
तब मन में प्रश्न उठा —
अगर यह गोपनीय है, तो क्या इसे भीड़ में डाल देना सही है?
या फिर इसे पात्र साधकों तक पहुँचाना चाहिए?
इसी चिंतन से रुद्र लोक का जन्म हुआ।
🔥
Rudralok अलग क्यों है?
आज यहां 100 से 150 पुस्तक हो चुका है वो भी तीन महीने में।
* यहाँ भीड़ नहीं, चयन है।
* यहाँ अव्यवस्था नहीं, व्यवस्थित Catalogue है।
* यहाँ मात्रा नहीं, गुणवत्ता है।
* यहाँ हर महीने नई दुर्लभ और प्रामाणिक पुस्तकें जोड़ी जाती हैं।
हर एक पुस्तक साधना के योग्य है।
📖
कैलाश रहस्य एक महासागर है।
🔱
रूद्रलोक एक संरक्षित गुफा है — जहाँ प्रवेश संख्या से नहीं, भावना से होता है।
अगर आप सच में तंत्र को समझना चाहते हैं —
तो Rudralok आपके लिए है।
अगर आप तंत्र को समझना, जीना और साधना चाहते हैं —
तो यह स्थान आपके लिए बनाया गया है।
🌑
सीमित स्थान। गंभीर साधकों के लिए।
#admin
#talk
@sanatanarahasya
भीम उवाच
अनारम्भपरो राजा वल्मीक इव सीदति ।
दुर्बलश्षानुपायेन बलिनं योडधितिष्ठति ।। ११ ।।
भीमसेन बोले--महाराज! जो राजा उद्योग नहीं करता तथा जो दुर्बल होकर भी उचित उपाय अथवा युक्तिसे काम न लेकर किसी बलवानसे भिड़ जाता है, वे दोनों दीमकोंके बनाये हुए मिट्टीके ढेरके समान नष्ट हो जाते हैं ।। ११ ।।
अतन्द्रितश्न प्रायेण दुर्बलो बलिनं रिपुम् जयेत् सम्यक् प्रयोगेण नीत्यार्थानात्मनो हितान् ।। १२
।।
परंतु जो आलस्य त्यागकर उत्तम युक्ति एवं नीतिसे काम लेता है, वह दुर्बल होनेपर भी बलवान शत्रुको जीत लेता है और अपने लिये हितकर एवं अभीष्ट अर्थ प्राप्त करता है ।। १२ ।।
#mahabharat
#second
#parv
समुद्र-मन्त्र-
अब मैं हिम से उत्पन्न समुद्र के मन्त्र को कहता हूँ। अमुकद्वीपावरक अमुकद्रव्योदधे अमुकं मे देहि दापय स्वाहा - यह समुद्रमन्त्र कहा गया है। (समुद्र चार प्रकार के होते हैं। उनमें से यदि क्षीरसागर का मन्त्र बनाना है तो वह इस प्रकार
ॐ क्षीरसागरद्वीपावरक्षीरद्रव्योदधे क्षीरं में देहि दापय स्वाहा।
इसी प्रकार इक्षुरस आदि सागरों के भी मन्त्र बनेंगे।) इस मन्त्र के ऋषि सिन्धुद्वीप, छन्द गायत्री एवं देवता तत्तत् सिन्धु कहे गये हैं। मन्त्र के छः पदों से इसका षडङ्गन्यास कहा गया है। जिस द्रव्य वाले समुद्र की उपासना करनी हो, उसी रूप का ध्यान करना चाहिये। मन्त्र का वर्णसहस्त्र जप करने के उपरान्त उपास्य समुद्र के द्रव्य से ही ही हवन करना चाहिये। ऐसा करने से उपासित द्रव्य वाले समुद्र के गर्भ में अवस्थित वस्तु को अवश्य ही साधक प्राप्त कर लेता है।।१५८-१६१।।
#mantra
#tantra
@sanatanarahasya
https://youtube.com/shorts/0Vx5roIDiMs?si=ANeUkRS7JubTqLxD
वामन-मन्त्र- अब मैं वामन के श्रेष्ठ मन्त्र को कहता हूँ। बत्तीस अक्षरों का वह मन्त्र है - ॐ नमो भगवते बलिसर्वस्वहारिणे अमुकं देहि ममाभीष्टमनेकं वामन ह्रीं श्रीं। इस मन्त्र के ऋषि काम, छन्द अनुष्टुप् एवं देवता वामन कहे गये हैं। मन्त्र के क्रमशः सात, आठ, बारह, तीन, एक एवं एक वर्णों से इसका षडङ्ग-न्यास कहा गया है।
बलि के सर्वस्व को ग्रहण करते हुये एवं प्रसन्नता-पूर्वक बलि को प्रदान करते वे दोनों (बलि एवं वामन) अत्यन्त प्रेम-पूर्वक अपने-अपने मनोरथ को प्राप्त किये -इस प्रकार का ध्यान करना चाहिये।
पूर्वोक्त विधि से वैष्णवपीठ पर अर्चन करने के उपरान्त मन्त्र का एक करोड़ जप पूर्ण करने के पश्चात् त्रिमधु-सिक्त बिल्वफलों से एक लाख आहुतियाँ प्रदान करते हुये हवन करना चाहिये। इसके बाद हवन का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन एवं मार्जन का दशांश ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। ऐसा करने से पापों का नाश करने वाली मन्त्रसिद्धि प्राप्त हो जाती है।
इस प्रकार सिद्ध मन्त्र वाले साधक को देव का ध्यान करके सिद्ध मन्त्र का जप करना चाहिये।
अभीष्ट प्रदान करते हुये देव का ध्यान करके मन्त्र का बत्तीस बार जप करने से वे देव साधक को उसका अभीष्ट मनोरथ प्रदान करते हैं;
इसमें कोई सन्देह नहीं है। अथवा वह साधक स्वयं को देवस्वरूप मानकर यदि दिन-रात इस मन्त्र का जप करता है तो वे देव प्रातःकाल स्वयं ही उस साधक को मन्त्र प्रदान करते हैं; साथ ही उसके मनोरम अभीष्ट को भी प्रदान करते हैं; फिर अन्य किसी देवता से क्या मतलब है।।१५४-१६१॥
ये रूद्र लोक पुस्तकालय से लिया गया है, जुड़ने के लिए message करें
@sanatanastro
को
#vaman
#mantra
@sanatanarahasya
जो मूढ मेरे भक्तकी निन्दा करता है वह देवदेवकी निन्दा करता है और जो उनको भक्तिसे पूजन करता है वह मेरा पूजन करता है ।। १३ ।। जो मेरे पूजनको पत्र पुष्प फल जल प्रदान करता है वह मेरा भक्त और मेरा प्रिय है ।। १४ ।।
मैं जगत्के आदिमें ब्रह्मा परमेष्ठीका निर्माण कर सम्पूर्ण वेदोंको प्रदान करता हुआ, जो मेरे मुखसे निकले हैं ।। १५ ।। में ही सम्पूर्ण योगियोंका अविनाशी गुरु हूँ धर्मात्माओंका रक्षक और वेदद्वेषियोंका नाशक हूँ ।। १६ ।।
मैं ही योगियोंके साथ सब संसारका मोचक हूँ, मैं ही सब संसारसे रहित सब संसारका हेतु हूँ ।। १७ ।। मेंही संहार करनेवाला और निर्माता तथा परिपालन करनेवाला हूँ मायावी मेरी शक्ति सब लोकको मोहित करती है ।। १८ ।।
#ramayan
#ram
#advut
@sanatanarahasya
हरिभक्ति देनेवाली होती है। प्रातःकाल तुलसीका दर्शन करनेसे सुवर्ण-दानका फल प्राप्त होता है।
(
ब्रह्मवैवर्तपुराण, कृष्ण० १०३। ६२-६३)
अपने घरसे दक्षिणकी ओर तुलसीवृक्षका रोपण नहीं करना चाहिये, अन्यथा यम-यातना भोगनी पड़ती है।
(
भविष्यपुराण म० १)
मालतीं मल्लिकां मोचां चिञ्चां श्वेतां पराजिताम्। वास्तुन्यां रोपयेद्यस्तु स शस्त्रेण निहन्यते ॥
(
वास्तुसौख्यम् ३९)
'मालती, मल्लिका, मोचा (कपास), इमली, श्वेता (विष्णुक्रान्ता) और अपराजिताको जो वास्तुभूमिपर लगाता है, वह शस्त्रसे मारा जाता है।'
ये
रूद्र लोक पुस्तकालय से लिया गया है, जुड़ने के लिए message करें
@sanatanastro
को
#vastu
#sastra
@sanatanarahasya