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अध्यात्म - Timeless Teachings

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आप इस समय विश्व के सर्वश्रेष्ठ, अद्भूत और अद्वितीय चैनल अध्यात्म - Timeless Teachings को सब्सक्राइब कर के पढ़ रहें है विश्व के सर्वश्रेष्ठ ज्ञान वेद, श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण और अन्य हिन्दू धर्म शास्त्रों के बारे में। Timeless Teachings For All.
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Категория канала
Религия и духовность
Пол аудитории
Женский
Возраст аудитории
35-44
Финансовый статус аудитории
Средний
Профессии аудитории
Образование
Краткое описание
February 26, 13:30

_*।। एकादशी स्मरणिका ।।*_
📢
आमलकी ( रंगभरी ) एकादशी के लिए उपवास कल 27 फरवरी 2026 को रखें। जो व्रत नही रखेंगे वो कमसे कम इस शुभ तिथि पे चावल का सेवन न करें।
*पारण का समय -* परसों 28 फरवरी 2026, सुबह 06:48 से 09:07 बजे के बीच
*जय श्री हरि*
🙏
*भगवद्गीता समूह*
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February 26, 05:59

_*।। श्रीमद्भगवद्गीता ।।*_
भेदभाव व्यक्ति के निजी जीवन से शुरु होता है।
व्यक्ति का जीवन कामनाओं से शुरु होता है और कामनाओं पर ही समाप्त होता है।
जो इससे ऊपर उठ गया वही योगी कहलाता है भगवान कहलाता है।
और कामनायें कहाँ निवास करती हैं?
कृष्ण कहते हैं कि काम और क्रोध मनुष्य के निर्माण में प्रयुक्त तीन ईंटों - सत, रज और तम, में जो रजस नाम की ईंट होती है वहां से उतपन्न होती हैं।
ये कामनाएं निवास कहाँ करती हैं?
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं -
*इन्द्रियाणि मनो बुद्धि अस्य अधिष्ठानम् उच्चयते।*
कामनाएं मनुष्य के मन बुद्धि और इंद्रियों में निवास करती हैं।
और इंद्रियों का क्या स्वभाव है?
*इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे राग द्वेष व्यवस्थितौ।।*
अर्थात इंद्रियों का स्वभाव है कामनाओं के संदर्ब में राग और द्वेष से ग्रसित होना।
जो कामनाओं की पूर्ति में सहयोगी हो, उसके प्रति राग, अर्थात पसन्द होना और जो कामनाओं में बाधक हो उसके प्रति द्वेष अर्थात नापसंदगी।
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इसी को भेदभाव कहते हैं।
यह मनुष्य के जीवन का अभिन्न हिस्सा है।
एक माता पिता के दो पुत्र होते हैं। दोनों में अगाध प्रेम होता है। फिर उसमें से एक माता पिता के मनोनुकूल काम करता है और उनके प्रतिकूल काम करने लगता है, विद्रोही हो जाता है। माता पिता का भाव अपने पुत्रों के प्रति भेदभाव वाला हो जाता है। एक पुत्र उन्हें प्रिय हो जाता है। दूसरा अप्रिय।
अब इन्हीं भाइयों में, जिनमें आपस मे अगाध प्रेम था, उनकी शादी व्याह हो जाता है, बच्चे हो जाते हैं। उनमें भी आपस में मतभेद शुरू हो जाता है। अपने पुत्र पुत्रियों और भाई के पुत्र पुत्रियों के प्रति उनके भाव अलग अलग हो जाते हैं। भेदभाव शुरू हो गया।
अपने घर परिवार समाज में देखिये।
आप अपने आपको देखिये। आपका एक दूर का रिश्तेदार है, उसके पास धन पद प्रतिष्ठा है, और एक आपका नजदीकी रिश्तेदार है, जिसके पास न धन है, न पद है, न प्रतिष्ठा है। आपका उन दोनों के प्रति क्या समान भाव रहता है? क्या आप उनसे भेदभाव नहीं बरतते?
यह संसार का नियम है।
अभी ट्रम्प को मोदी जी की बात पसंद नहीं आयी तो उसने टैरिफ ठोंक दिया। तो देखा क्या क्या हुवा?
संसार का कोई भी कोना है, कोई युग रहा है जो भेदभाव से मुक्त रहा है?
अपेक्षा यह होनी चाहिए कि राजा या सरकार जो भी उसे आप कहें, उसको भेदभाव रहित व्यवहार करना चाहिये।
लेकिन इसके लिए भी नियंम है। कौटिल्य कहते है कि राजा और राजकर्मचारी को इन्द्रीयजयी होना चाहिए।
लोकतंत्र में इंद्रिय जयी नेतृत्व खोजना मुश्किल नहीं है, असंभव है।
क्योंकि बुद्धिपंगु लबार नेतृत्व की कतार खड़ी है। जिसको न अपने ग्रंथों का ज्ञान है न ही अपनी सभ्यता का। न मनुष्य की साइकोलॉजी का।
*भगवद्गीता समूह*
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February 26, 02:56

*आजकल श्याम जी खाटू का मेला चल रहा है।*
मुख्य मेला फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वादसी को पड़ता है जो परसों 28 फरवरी को हैं। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी के दिन से ही मेले का आरंभ हो गया है जो होली तक चलेगा। कुम्भ के मेले के पश्चात सर्वाधिक भीड़ इस मेले में होती है। भगवान की भक्ति की पराकाष्ठा देखनी हो तो इस मेले से अधिक अच्छा संभवतः ही अन्यत्र कहीं देखने को मिलेगा। हर रास्तों से लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ इस समय हाथों में ध्वज लिए पैदल ही भजन-कीर्तन करते हुए खाटू की ओर बढ़ रही है। थोड़ी थोड़ी दूर पर हज़ारों सेवार्थी -- आगंतुकों की सेवा में खड़े हैं। एकादशी को तो पूरी रात ही भजन-कीर्तन होते हैं, कोई नहीं सोता। यह मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में पड़ता है। सबसे समीप का रेलवे स्टेशन रींगस है। राजस्थान में शेखावाटी की संस्कृति और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति ही देखनी हो तो एक बार यहाँ अवश्य आना चाहिए। प्रशासन और स्वयंसेवकों के द्वारा बहुत अच्छी व्यवस्था रहती है।
.
इस स्थान की महिमा और कथा का वर्णन पौराणिक है। इस मंदिर का विस्तृत इतिहास राजस्थान पत्रिका के "नगर परिक्रमा" स्तम्भ के अंतर्गत एक बार छपा था। दो बार मुग़ल शासकों ने इस मंदिर को तोड़ा था। एक बार तो औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया था। उस समय इस मंदिर की रक्षा के लिए अनेक क्षत्रियों ने अपना प्राणोत्सर्ग किया था। फिर दुबारा मुग़ल बादशाह फर्रूखशियर ने इसको तोड़ा था तब क्षेत्र के क्षत्रियों और दादुपंथी नागा साधुओं के साथ साथ अनेक ब्राह्मणों ने भी शस्त्र उठाकर युद्ध किया था। उस समय नागा साधुओं के महंत मंगल दास और उनके भंडारी सुन्दर दास की कथा बहुत प्रसिद्ध हुई थी। उनके सिर कट गये पर धड़ युद्ध करते करते मुग़ल सेना के अन्दर तक चले गये गये, जिससे डर कर मुग़ल सेना भाग खड़ी हुई। मुगल बादशाह फर्रूखशियर ने उनके पैरों में पड़कर माफी माँगी और स्वयं को गाफिल बताया तब जाकर वे धड़ शांत हुए। तब एक कहावत पड़ी थी -- "शीश कटा खाटू लड़े महंत मंगलदास"। फिर कभी मुग़ल सेना का इस ओर आने का साहस नहीं हुआ।
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यहाँ श्रद्धालुओं की भक्ति और लगन देखकर कोई भी भाव विह्वल हो जाएगा। भगवान श्रीकृष्ण और उनके भक्त बर्बरीक की जय, जिनका भव्य मंदिर खाटू ग्राम में खाटू श्याम जी के नाम से प्रसिद्ध है। जय हो।
*भगवद्गीता समूह*
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February 26, 00:36

_*।। सौभाग्य का निर्माण करें ।।*_
पुरुषार्थ से ही भाग्य को सौभाग्य में बदला जा सकता है। किस्मत से मिलता अवश्य है, लेकिन केवल उतना, मेहनत करने वाले जितना छोड़ देते हैं। मेहनत की अपेक्षा केवल किस्मत में ज्यादा विश्वास रखने से जीवन में कुछ श्रेष्ठ की प्राप्ति नहीं की जा सकती है। किसी की शानदार कोठी देखकर लोग ये तो कह उठते हैं कि काश अपनी किस्मत भी ऐसी होती लेकिन वे यह भूल जाते हैं, कि ये शानदार कोठी, शानदार गाड़ी किसी को भी केवल किस्मत ने ही नहीं दी अपितु इसके पीछे उसकी कड़ी मेहनत भी रही है।
यद्यपि जीवन में किस्मत का भी अपना महत्व है। ये भी कहना उचित नहीं कि किस्मत का कोई स्थान ही नहीं, कोई महत्व ही नहीं। मेहनत करने के बाद किस्मत पर आश रखी जा सकती है, लेकिन खाली किस्मत के भरोसे सफलता प्राप्त करने से बढ़कर कोई दूसरी नासमझी नहीं हो सकती है। जीवन में एक बात अवश्य याद रखना कि पुरुषार्थ ही श्रेष्ठ भाग्य का निर्माणकर्ता भी होता है।
*आज का दिन शुभ मंगलमय हो।*
*भगवद्गीता समूह*
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February 25, 13:15

_*।। श्रीरामचरितमास - विचार ।।*_
चले साथ अस मंत्रु दृढाई।
सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई
राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही।
बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही।।
( अयोध्याकाण्ड 83/4 )
राम जी सबको समझाकर वन चल पड़े हैं। सबने विचार किया कि राम जी के बिना अयोध्या में हमारा कोई काम नहीं है । देव दुर्लभ सुखों से युक्त घरों को छोड़कर सब राम जी के साथ चल पड़े हैं। जिन्हें राम चरण प्रिय होता है, उन्हें विषय भोग भला क्या अपने वश में कर सकते हैं ? अर्थात नहीं ।
मित्रों ! जब राम चरण प्रिय हो जाते हैं, तब विषय भोग अप्रिय हो जाते हैं। राम प्रियता सुख देती है जबकि विषय भोग दुख देते हैं। अतः अयोध्या वासियों की तरह राम चरणों के प्रेमी बनें । अथ! जय जय राम चरण, जय रघुनाथ चरण
🚩
*भगवद्गीता समूह*
https://chat.whatsapp.com/K0muEAb70c8Cusr1dyJVKP?mode=gi_t

February 25, 06:16

_*।। होली के रसिया ।।*_
रसिया को नार बनावो री रसिया को ॥
कटि लहंगा गल माल कंचुकी,
वाको चुनरी शीश उढाओ री,
रसिया को नार बनावो री रसिया को ॥
बाँह बडा बाजूबंद सोहे,
वाको नकबेसर पहराओ री,
रसिया को नार बनावो री रसिया को ॥
लाल गुलाल दृगन बिच काजर,
वाको बेंदी भाल लगावो री,
रसिया को नार बनावो री रसिया को ॥
आरसी छल्ला और खंगवारी,
वाको अनपट बिछुआ पहराओ री,
रसिया को नार बनावो री रसिया को ॥
नारायण करतारी बजाय के,
वाको जसुमति निकट नचाओ री,
रसिया को नार बनावो री रसिया को ॥
रसिया को नार बनावो री रसिया को ॥
रसिया को नार बनावो री रसिया को ॥
*भगवद्गीता समूह*
https://whatsapp.com/channel/0029VaSeiKrKWEKozcCCW50w

February 25, 03:39

_*।। मनुष्य के मन से जन्मा युद्ध ।।*_
युद्ध का प्रारंभ अपने वश में होता है, किन्तु उसका अन्त किसी के वश में नहीं होता। युद्ध का अन्त कैसे होगा ? कहाँ होगा ? यह कोई भी नहीं जानता।
एक समय रूस-यूक्रेन सोवियत संघ ही था, आज उसी सोवियत के सामान्य नर-नारी तथा आबाल-वृद्धों पर वही रूस और यूक्रेन विध्वंसक अस्त्र एक दूसरे पे फ़ेंक रहें है।
युद्ध की यह आग इतनी प्रज्ज्वलित हो चुकी है कि उसकी चपेट विश्वमानवता को झुलसाने को उद्यत है।
युद्ध से मनुष्य डरता है परंतु यह भी सत्य है कि युद्ध का जन्म मनुष्य के मन में ही होता है।मनुष्य का विवेक हर बार युद्ध की निंदा करता है।
जीवन के प्रवाह में जब मनुष्य की नैसर्गिक-वृत्तियाँ, आदिम-वासनाएं और मनोविकार भूख, रति, तृष्णा, अहंकार, भय, क्रोध, ईर्ष्या, अमर्ष, मोह, ममता, होड़, प्रभुता एक बिन्दु पर आ मिलते हैं, तब उनका विस्फोट युद्ध के रूप में होता है !
*आज का दिन शुभ मंगलमय हो।*
*भगवद्गीता समूह*
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February 24, 03:06

_*।। श्रीरामचरितमास - विचार ।।*_
प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई ।
हारहिं सकल सलभ समुदाई ।।
खल कामादि निकट नहिं जाहीं।
बसइ भगति जाके उर माहीं ।।
( उत्तरकांड 119/3 )
गरुड़ जी के द्वारा ज्ञान व भक्ति के बारे में पूछने पर भक्ति के बारे में बताते हुए भुसुंडि जी कहते हैं कि जिसके भी हृदय में भक्ति बस जाती है उसके हृदय से अविद्या का अंधकार मिट जाता है, मदादि पतंगों का सारा समूह हार जाता है । काम, क्रोध, लोभ आदि दुष्ट तो उसके पास भी नहीं जाते हैं ।
मित्रों! राम जी की भक्ति की ऐसी महिमा है कि यह जीव के हृदय को पूर्ण रूप से शुद्ध कर देती है जिस कारण से अशुद्ध खलों की एक भी नहीं चलती है । अतः जगत के सकल खलों से मुक्ति चाहते हैं तो राम भक्ति धारण कर निश्चिंत जीवन व्यतीत करें । अथ ! जय जय राम भगति , जय रघुनाथ भगति
🚩
*भगवद्गीता समूह*
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February 24, 01:15

_*।। होलाष्टक आरम्भ।।*_
इस आंग्ल वर्ष 2026 में होलाष्टक आज 24 फरवरी को लगेगा, और यह 03 मार्च 2026 तक रहेगा। यह 8 दिनों का होता है, तथा इस काल में किसी भी तरह के शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं।
भारतीय मुहूर्त विज्ञान व ज्योतिष शास्त्र प्रत्येक कार्य के लिए शुभ मुहूर्तों का शोधन कर उसे करने की अनुमति देता है। कोई भी कार्य यदि शुभ मुहूर्त में किया जाता है, तो वह उत्तम फल प्रदान करने वाला होता है। इस धर्म धुरी से भारतीय भूमि में प्रत्येक कार्य को सुसंस्कृत समय में किया जाता है, अर्थात्‌ ऐसा समय जो उस कार्य की पूर्णता के लिए उपयुक्त हो।
इस प्रकार प्रत्येक कार्य की दृष्टि से उसके शुभ समय का निर्धारण किया गया है। जैसे गर्भाधान, विवाह, पुंसवन, नामकरण, चूड़ाकरन, विद्यारम्भ, गृह प्रवेश व निर्माण, गृह शान्ति, हवन यज्ञ कर्म, स्नान, तेल मर्दन आदि कार्यों का सही और उपयुक्त समय निश्चित किया गया है। इस प्रकार होलाष्टक को ज्योतिष की दृष्टि से एक होलाष्टक दोष माना जाता है, जिसमें विवाह, गर्भाधान, गृह प्रवेश, निर्माण, आदि शुभ कार्य वर्जित हैं।
इस वर्ष होलाष्टक 24 फरवरी मंगलवार से प्रारम्भ हो रहा है, जो 03 मार्च होलिका दहन ( फाल्गुन पूर्णिमा ) के साथ ही समाप्त हो जाएगा, अर्थात्‌ आठ दिनों का यह होलाष्टक दोष रहेगा। जिसमें सभी शुभ कार्य वर्जित है।
इस समय विशेष रूप से विवाह, नए निर्माण व नए कार्यों को आरम्भ नहीं करना चाहिए। ऐसा ज्योतिष शास्त्र का कथन है। अर्थात्‌ इन दिनों में किए गए कार्यों से कष्ट, अनेक पीड़ाओं की आशंका रहती है, तथा विवाह आदि सम्बन्ध विच्छेद और कलह का शिकार हो जाते हैं, या फिर अकाल मृत्यु का खतरा या बीमारी होने की आशंका बढ़ जाती है।
होलाष्टक से तात्पर्य है कि होली के 8 दिन पूर्व से है अर्थात धुलण्डी से आठ दिन पहले होलाष्टक की शुरुआत हो जाती है। इन दिनों शुभ कार्य करने की मनाही होती हैं। हिन्दू धर्मो के 16 संस्कारों को न करने की सलाह दी जाती है।
*क्या करते हैं होलाष्टक में*
माघ पूर्णिमा से होली की तैयारियाँ शुरु हो जाती हैं। होलाष्टक आरम्भ होते ही दो डण्डों को स्थापित किया जाता है, इसमें एक होलिका का प्रतीक है और दूसरा प्रह्लाद से सम्बन्धित है। ऐसा माना जाता है कि होलिका से पूर्व 8 दिन दाह-कर्म की तैयारी की जाती है।
यह मृत्यु का सूचक है। इस दुःख के कारण होली के पूर्व 8 दिनों तक कोई भी शुभ कार्य नही होता है। जब प्रह्लाद बच जाता है, उसी खुशी में होली का त्योहार मनाते हैं।
ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के अपराध में कामदेव को शिव जी ने फाल्गुन की अष्टमी में भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति ने उस समय क्षमा याचना की और शिव जी ने कामदेव को पुनः जीवित करने का आश्वासन दिया। इसी खुशी में लोग रंग खेलते हैं।
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*फिर भी क्यों हो रहा है कुछ जगहों पे विवाह और गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य?*
- कुछ परिवार पंचांग के विशेष मुहूर्त देखकर (जैसे अगर कोई बहुत मजबूत शुभ योग हो) या व्यक्तिगत जन्म कुंडली के आधार पर कर लेते हैं।
- आधुनिक जीवन में डेट्स फिक्स होने, मेहमानों की सुविधा, या कोर्ट मैरिज जैसी वजहों से लोग नियम तोड़ देते हैं।
- कुछ क्षेत्रों में परंपरा कम सख्त होती है, या लोग इसे सिर्फ "मान्यता" मानकर इग्नोर कर देते हैं।
- लेकिन अधिकांश ज्योतिषी और पारंपरिक परिवार सलाह देते हैं कि टालना ही बेहतर है, क्योंकि शास्त्र में स्पष्ट निषेध है।
अगर आपके आसपास ऐसा हो रहा है, तो शायद वे लोग इन नियमों को कम महत्व देते हैं या मजबूरी में कर रहे हैं। लेकिन शास्त्रानुसार होलिका दहन के बाद ( 4 मार्च 2026 से ) शुभ मुहूर्त में करना सबसे उत्तम होता है।
*भगवद्गीता समूह*
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February 24, 00:45

_*।। असंतोष से बचें ।।*_
हमारे जीवन के बहुत सारे दुःखों के मूल में असंतोष ही कारण होता है। असंतोषी व्यक्ति को जीवन में कभी सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती है। हमारा सुख इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने धनवान हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हम कितने धैर्यवान हैं। सुख अथवा प्रसन्नता किसी व्यक्ति की स्वयं की मानसिकता पर निर्भर करता है। सुख का अर्थ कुछ पा लेना नहीं अपितु जो है, उसमें संतोष कर लेना है।
जीवन में सुख तब नहीं आता जब हम कुछ पा लेते हैं अपितु तब आता है, जब सुख पाने का भाव हमारे भीतर से चला जाता है। सोने के महल में भी आदमी दुःखी रह सकता है यदि पाने की इच्छा समाप्त न हुई हो और झोपड़ी में भी आदमी परम सुखी हो सकता है यदि ज्यादा पाने की लालसा मिट गई हो। सुख बाहर की नहीं, भीतर की संपदा है एवं यह संपदा धन से नहीं, धैर्य से प्राप्त होती है।
*आज का दिन शुभ मंगलमय हो।*
*भगवद्गीता समूह*
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