
ब्रह्मचर्य
उठो!अपने आपको भगवान को अर्पित करो अपनी चिंता दुख तनाव सब भगवान को अर्पित करो तुम अकेले नहीं हो।
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गीता का सिद्धांत है - 'आत्मवत सर्व भूतेषु य: पश्यति सः पण्डितः' I जो सबको अपने समान देखता है वही सच्चा ज्ञानी है I
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The Gita's principle is : - "One who sees all being as oneself is truly wise."
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https://youtu.be/XXYZ2vaKCSA?si=OOH2kIYD8pBjacOL
सड़क के किनारे किसी का घर हो तो यदि कोई कहे की बैलगाड़ी नहीं आये केवल गाड़िया आये तो झगड़ा हो जायेगा
गाड़ियों को जैसे हम देखते रहते है किसी से जुड़ते नहीं कोई आओ जाओ वैसे मन मे अनुकूलता,प्रतिकूलता अच्छे बुरे विचार, परिस्थितियों की गाड़िया आएगी जाएगी आप बस आत्मा मे बैठकर देखते रहो
( साक्षी भाव)
तो शांति बनी रहेंगी।
हम धीरे-धीरे वैसे बनते जाते हैं, जिसे हम बार-बार याद करते हैं।
स्मरण केवल किसी का चेहरा नहीं लाता,
उसके गुण भी हमारे भीतर जगाने लगता है।
मन जिन विचारों को दोहराता है,
वे ही हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं।
यदि हम भय को पकड़े रहें, तो अस्थिरता बढ़ती है।
यदि हम ईश्वर को याद करें, तो शक्ति और शांति भीतर उतरने लगती है।
ईश्वर का स्मरण केवल पूजा नहीं,
एक ऊँची चेतना से जुड़ना है।
जिससे रोज़ जुड़ते हो,
वैसी ही ऊर्जा जीवन में उतरती है।
ओ३म् नाम जपना
@vaidic_bhajan
लोग कहते हैं कि "बुरा देखना पाप है, बुरा सुनना पाप है, बुरा बोलना पाप है, और शरीर से बुरे काम करना भी पाप है।" जी हां, लोग ठीक कहते हैं। *"बुरा देखना बुरा सुनना और शरीर से बुरे काम करना, यह सब पाप है।"*
परंतु वेद आदि शास्त्र कहते हैं कि *"पाप केवल इतना ही नहीं है। बल्कि इन सब का मूल कारण है बुरा सोचना। जैसे बुरा देखना पाप है, बुरा सुनना बुरा बोलना बुरे काम करना भी पाप है। ऐसे ही इन सब का मूल कारण "बुरा सोचना" भी पाप है।"*
*"जो व्यक्ति जैसा सोचता है, वह वैसा ही देखता सुनता बोलता और वैसे ही काम करता है।"* इसका अर्थ हुआ कि *"सब पापों का मूल कारण "बुरा सोचना" ही है।"*
यदि आप बुरे कामों या पापों से बचना चाहते हों, तो इसका उपाय यही है, कि *"अपने चिंतन को ठीक करें। अपने सोचने को ठीक करें।बुरा न सोचें, बल्कि अच्छा सोचें। अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी सबके लिए अच्छा सोचें।"*
"यदि आप इस प्रकार से अपने चिंतन को ठीक करके अच्छा देखेंगे अच्छा सुनेंगे अच्छा बोलेंगे और शरीर से भी अच्छे काम करेंगे। तो इन सब अच्छे कर्मों को करके आप बहुत सा पुण्य कमाएंगे।"*
*"और यदि आप पुण्य कर्मों का आचरण करेंगे, तो निश्चित रूप से ईश्वर आपको सुख देगा। आपका यह जन्म भी सुखदायक होगा और अगला भी।"*
*"अतः अच्छा सोचें, अच्छा बोलें। अच्छा देखें अच्छा सुनें और शरीर से भी अच्छे काम ही करें।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*